आज हम आपको बताते हैं कि मानसिक (Psychiatric) बीमारियों में अधिकतर इन्वेस्टिगेशन (जांचें) नॉर्मल क्यों आती हैं।

जांचों का उद्देश्य

मानसिक बीमारियों में जो भी टेस्ट कराए जाते हैं, वे बीमारी की डायरेक्ट पहचान के लिए नहीं होते। इन्हें कराने का उद्देश्य यह होता है कि मानसिक बीमारी के लक्षण किसी और शारीरिक बीमारी के कारण तो नहीं हैं। जैसे कि:

  • CT स्कैन
  • ब्लड इन्वेस्टिगेशन
  • अन्य न्यूरो-इमेजिंग जांच

ये जांचें अक्सर अन्य बीमारियों को रूल-आउट करने के लिए होती हैं।

मरीज का सवाल

अक्सर मरीज पूछते हैं: "सर, अगर सभी जांचें नॉर्मल हैं, तो हमें यह परेशानी क्यों हो रही है?"

असल कारण

इसका कारण यह है कि मानसिक बीमारियों का मूल कारण न्यूरॉनल लेवल पर होता है। यानी दिमाग के न्यूरॉन्स सही ढंग से काम नहीं कर पाते (Neuronal Dysfunction)। और यह समस्या आज उपलब्ध सामान्य इन्वेस्टिगेशंस में पकड़ में नहीं आती।

अगर दिमाग में चोट, खून का थक्का, सूजन या इंफेक्शन जैसी समस्या हो, तो वह न्यूरो-इमेजिंग (जैसे MRI/CT) में आसानी से दिखाई दे जाती है। लेकिन मानसिक बीमारियों की पैथोलॉजी बहुत गहरे स्तर पर होती है। इसमें कोई बड़ा एनाटॉमिकल चेंज (संरचनात्मक बदलाव) नजर नहीं आता, केवल फंक्शनल (कार्यात्मक) समस्या होती है।

निष्कर्ष

इसीलिए मानसिक बीमारियों में अधिकांश जांचें नॉर्मल आती हैं। ये जांचें इसलिए कराई जाती हैं ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि कोई और बीमारी मानसिक लक्षणों की वजह तो नहीं है।

धन्यवाद।